November 13, 2018

प्रीमैच्योर डिलीवरी क्यों होती हैऔर प्रीमैच्योर शिशु का ध्यान कैसे रखें?Premature delivery

प्रीमैच्योर डिलीवरी क्यों होती हैऔर प्रीमैच्योर शिशु का ध्यान कैसे रखें?Premature delivery

                                     कुछ महिलाओं में गर्भावस्था के समय कुछ ऐसी अनचाही स्थितियाँ आ जाती हैं जब उन्हें शिशु की समय से पहले प्रसूति(डिलीवरी) करवानी पड़ती है।आखिर क्या कारण हो जाता है कि नन्हे जीव को अपना 9 महीने का सफर पूरे किए बिना ही मां की सुरक्षित कोख छोड़कर बाहर निकलकर कृत्रिम सांसो का सहारा लेना पड़ता है |

                                      सामान्यतः शिशु मां की कोख में 40 हफ्तों तक रहता है गर्भधारण के बाद 36 हफ्तों से पहले हुई डिलीवरी को असमय प्रसव यानी प्री- टर्म लेबर कहते हैं| आमतौर पर 10% प्रेगनेंसी में इस तरह की समस्या आ सकती है| प्रीमेच्योर बेबी के कई कारण हो सकते हैं जैसे:-

  • मां के रोग या गर्भाशय संबंधी समस्या
  • मां के भ्रूण संबंधी रोग
  • प्लेसेंटा का विकार

                           यदि मां को ब्लड प्रेशर की समस्या है,डायबिटीज है, या एनिमिक है  तो उस समय डिलीवरी का खतरा हो सकता है भ्रूण का विकारयुक्त आकार या जुड़वा बच्चे भी इसका कारण हो सकते हैं अथवा प्लेसेंटा यानी गर्भनाल में किसी भी प्रकार का विकार हो तो भी इस तरह की संभावना हो जाती है और कभी-कभी तो कारण को जानना ही मुश्किल हो जाता है | इसके अलावा मां की उम्र यदि 17 वर्ष से कम है या 35 वर्ष से ज्यादा है,सही पोषण नहीं मिल पाया है, सिगरेट शराब की आदत है, तो ऐसी महिलाएं भी इस दौर से गुजर सकती हैं और बच्चे का जन्म समय से पहले हो सकता है|

                              शरीर के सभी अंग आमतौर पर हमारी जिंदगी खत्म होने तक हमारा साथ देते हैं किंतु नारी शरीर का अंग जिसे प्लेसेंटा कहते हैं यदि यह किसी विकार के कारण सूखने लगता है या गर्भाशय विकार, मां के रोग अथवा भ्रूण में विकार हो तो भ्रूण बाहर आ जाता है और यही प्रीमेच्योर प्रसव कहलाता है|

आइए जानते हैं किअसमय जन्मे बच्चों की सबसे प्रमुख समस्या क्या होती है और उनकी देखभाल कैसे कर सकते हैं|

                                आमतौर पर साढ़े आठ महीने का बच्चा पूर्ण रूप से विकसित हो जाता है इसके सब अंग सक्षम व विकसित हो जाते हैं उसमें रोगों से लड़ने की क्षमता आ जाती है जैसे जैसे बच्चे का विकास होता है उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती जाती है लेकिन 24 हफ्ते के बच्चे को बचाना मुश्किल होता है खासकर भारत में क्योंकि एक तो यहां की परिस्थितियां दूसरे देशों से भिन्न है दूसरा इसका खर्च भी बहुत ज्यादा हो जाता है इतने छोटे बच्चे को बचा भी लिया तो शिशु में शारीरिक मानसिक कमी या दोष रह जाने की संभावना काफी रहती है किंतु 27 हफ्तों के बादअसमय जन्मे बच्चे के बच जाने की पूरी संभावना है बशर्ते वह सही हाथों में हो और ठीक तरीके से उसकी देखभाल हो|

                                बहुत छोटे बच्चे जैसे 26 से 28 हफ्ते का शिशु जिनके फेफड़ों का विकास नहीं हुआ है उन्हें देखभाल की बहुत ज्यादा जरूरत होती है उन्हें लेवल 3 नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट में रखना पड़ता है ऐसे बच्चों को वेंटिलेटर में रखा जाता है|फेफड़ों में सरफेक्टेन्ट  डाला जाता है धीरे-धीरे बच्चे का ऑक्सीजन लेवल बढ़ जाता है बच्चा ठीक से सांस लेने लगता है हां यदि सरफेक्टेन्ट की मात्रा निर्धारित करने में अनुभव की कमी है और मात्रा सही नहीं है याहमें जो चाहिए हमें वह ऑक्सीजीनेशन लेवल ठीक नहीं है तो किडनी हार्ड ब्रेन कहीं भी विकार आ सकता है |

                             प्रीमैच्योर बच्चों के पोषण का खास ध्यान रखा जाता है पोषण ऐसा दिया जाता है कि विकास सही व संपूर्ण हो| यह पोषणC.V.L. (सेंट्रल विनस लाइन )द्वारा शरीर में पहुंचाया जाता है पोषण में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन, वसा और मिनरल सभी को शामिल किया जाता है वैसे तो मां का दूध पहली प्राथमिकता होती है उसे एक्सप्रेस करके या तो मैं खुद दे जाती है या परिवार का कोई अन्य सदस्य दे सकता है| मां के दूध के अभाव में बाहरी पोषण दिया जाता है खुराक की मात्रा निर्धारित करते समय खास ध्यान रखना पड़ता है| जरूरत से ज्यादा भी ज्यादा मात्रा हो जाने पर आंतों को हानि पहुंचने की संभावना रहती है पूरे पोषण तक पहुंचते-पहुंचते करीब 15- 20 दिन लग जाते हैं

                             बच्चा यदि 27 हफ्ते में हुआ है तो उसे गर्भधारण से 34 हफ्ते तक का होने तक केयर सेंटर में रखा जाता है |32 हफ्ते के बच्चे को मां का निप्पल चूसना आ जाता है लेकिन चूसकर दूध अपने शरीर में उतार सके यह क्रिया 34 हफ्तों का बच्चा ही कर पाता है इसलिए जब तक वह 34 हफ्तों का नहीं हो जाता उसे केयर सेंटर में रखा जाता है |

                             केयर सेंटर में समय-समय पर जरूरत के अनुसार टेस्ट व लगातार मॉनिटरिंग की जाती है| घर भेजने से पहले एक बार फिर सब जांच परख लिया जाता है| सारे चेकअप कर लिए जाते हैं| बच्चा कांच की तरह होता है 40 हफ्ते तक बहुत ही संभाल कर उसकी देखभाल करें घर पहुंचने के बाद सबसे जरूरी बात है कि उसे पूर्ण रूप से हाइजीनिक वातावरण दें जहां तक हो मां के अलावा दूसरे लोग पास ना जाएं यदि जाएं भी तो कपड़े बदल कर और हाथ धोकर यदि किसी को खांसी जुकाम जैसी शिकायत हो तब तो बिल्कुल भी ना जाएं क्योंकि इस समय जन्मे बच्चे किसी भी समस्या के शिकार हो सकते हैं |

                             केयर सेंटर में तो हर आवश्यक परीक्षण होते रहते हैं जैसे हेड अल्ट्रासाउंड, आई टेस्ट, साउंड टेस्ट आदि किंतु घर लाने के बाद भी 1 साल तक हर 3 महीने में बच्चे के रिफ्लेक्शन टेस्ट अर्थात प्रतिक्रियात्मक परीक्षण होने चाहिए इस तरह यदि कोई विकार है तो शीघ्र ही पकड़ में आ जाएगा और इलाज तुरंत शुरू किया जा सकता है दूसरे साल में भी यह परीक्षण 6 महीने के दौरान होना चाहिए|

                              गर्भस्थ शिशु व मां की अवस्था देखते हुए यदि प्रीमेच्योर बर्थ की शंका है तो डिलीवरी से पहले ही मां को ऐसे जगह यानी ऐसे हॉस्टल वाली जगह में ले जाएं जहां लेवल 3 यानी एनआईसीयू सुविधा उपलब्ध है यदि स्थिति काबू से बाहर है और बच्चा असमयआ ही गया है तो उसके केयर सेंटर तक पहुंचने तक बच्चे का टेंपरेचर, ब्लड ग्लूकोस तथा ऑक्सीजीनेशन को बरकरार रखना बेहद जरूरी है|

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