November 13, 2018

गर्भावस्था के दौरान भोजन कैसा होना चाहिए, What should be the food during pregnancy

for gharelu paramarsh

गर्भावस्था के दौरान भोजन कैसा होना चाहिए, What should be the food during pregnancy       

           गर्भावस्था के दौरान महिलाओं के शरीर में हुए परिवर्तनों के कारण खाने के प्रति अरुचि पैदा होती है जबकि असलियत यह है कि इस समय उसका भोजन और अधिक पौष्टिक व संतुलित होना चाहिए | इस समय आहार में 2 जीवो के स्वास्थ्य का ध्यान रखना जरूरी होता है |

          यदि गर्भवती महिला डायबिटीज रोग से ग्रस्त है तो उसे चिकित्सक के परामर्श से पौष्टिक भोजन लेना चाहिए | यह भी जरूरी है कि वह बीच में शुगर की मात्रा की जांच कराएं |

           भोजन पौष्टिक व संतुलित होना चाहिए | भोजन के पौष्टिक होने की बात तो लोगों को समझ आती है जबकि संतुलन वाली नहीं | आइए, इस बात को सही तरीके से समझते हैं | गर्भवती के आहार में प्रोटीन, विटामिन, खनिज, लवण, वसा और जल की संतुलित मात्रा होना चाहिए | तीन-चार माह के गर्भस्थ शिशु में अस्थियों का विकास होता है इसलिए उस समय शरीर में कैल्शियम की मांग बढ़ जाती है यही कारण है कि उस समय महिलाएं राख,मिट्टी,चॉक व स्लेट आदि खाने लगती हैं | यदि महिलाएं ऐसा करें तो यह इस बात का संकेत है कि उनके शरीर में कैल्शियम की पूर्ति नहीं हो पा रही है |

         कुछ महिलाएं जल की उपेक्षा करती है | जल का पाचन क्रिया में विशेष महत्व है | यह शरीर से उत्पन्न विषकाणो को निकालने की प्रक्रिया में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है | रक्त निर्माण में भी जल का विशेष रूप से योगदान है | गर्भावस्था के समय होने वाली कब्ज की समस्या को दूर हटाने में संतुलित जल की महत्वपूर्ण भूमिका होती है |

        गर्भावस्था के समय में पर्याप्त कैलोरी व वसा की तुलना में प्रोटीन की ज्यादा मात्रा में जरूरत होती है |साधारण प्रोटीन के अलावा 20 ग्राम प्रोटीन अलग से | शरीर में यदि प्रोटीन की कमी हो, तो ऑक्सीजन ग्रहण करने की क्षमता में कमी आ जाती है इससे गर्भस्थ शिशु का मानसिक विकास भी नकारात्मक रूप से प्रभावित हो सकता है | प्रोटीन को पचाने के लिए विटामिन की जरूरत होती है और विटामिन इसलिए भी जरूरी है ताकि गर्भस्थ शिशु को पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्व मिल सके | विटामिंस की पूर्ति के लिए बेहतर तो यही होगा कि प्राकृतिक स्रोतों को ही अपनाया जाए लेकिन यदि ऐसा नहीं हो पा रहा है तो चिकित्सक की सलाह लेकर इन कमियों को पूरा किया जा सकता है |

       शरीर के निर्माण में खनिजों की अहम भूमिका है शरीर का 1/25 भाग खनिजों से ही निर्मित होता है इसलिए इनकी शरीर में कमी ना हो, इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए | फास्फोरस अस्थियों के निर्माण के साथ ही रक्त को शुद्ध करता है और स्नायुओ को सशक्त बनाता है इसकी कमी से शिशु के मानसिक विकास पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है |

        दालों सब्जियों व दुग्ध उत्पादों से उपरोक्त सभी जरूरतों को स्वाभाविक रूप से पूरा किया जा सकता है | जो मांसाहारी है वह मांस, मछली, अंडा आदि का सेवन कर ऐसा कर सकते हैं हां उन्हें इस प्रकार की खाद्य सामग्री खरीदते समय विशेष रुप से ध्यान रखना चाहिए कि वह ताजी हो और निरोगी हो |

       गर्भवती को ऐसी चीजें नहीं खानी चाहिए जो गरिष्ठ हो जिन्हें पचाने में श्रम की आवश्यकता हो | गैस पैदा करने वाली खाद्य सामग्री से भी परहेज करें सहूलियत के लिए यहां गर्भवती महिला के संतुलित भोजन की तालिका दी जा रही है |

        आहार                                                       मात्रा (ग्राम) में

  • दूध, दही आदि                                                                          400 – 500 gm
  • हलवा हरी सब्जियां                                                                   200 – 300 gm
  • चावल गेहूं                                                                                   150 – 200 gm
  • मांस मछली अंडा                                                                             60 – 70 gm
  • दाल, चना, राजमा                                                                            50 – 60 gm
  • चीनी गुड़ शक्कर आदि                                                                      40 -45 gm
  • घी, तेल, मक्खन आदि                                                                         35-40 gm

      यदि गर्भवती महिला कुपोषण का शिकार है तो गर्भ में पल रहे शिशु के दिमाग पर इसका बुरा असर पड़ता है | जिससे वह मानसिक रुप से कमजोर हो सकता है | कुछ अन्य कारणों के अलावा शिशु की बुद्धि का विकास इस बात पर भी निर्भर करता है कि वह गर्भ में कितनी देर तक और कितने पौष्टिक आहार से दूर रहा है |

       गर्भावस्था में तीसरे से छठे महीने का समय ऐसा होता है जब शिशु के दिमाग का तेजी से विकास होता है और यह विकास उसके पैदा होने के 2 साल बाद तक इसी रफ्तार से होता है |

       कुपोषण के शिकार शिशुओं के दिमाग में कोशिकाएं कम होती है और इस नुकसान की भरपाई कभी नहीं हो सकती | हालांकि शिशु में भरपूर पौष्टिक आहार की कमी अगर बाद की अवस्था में होती है तो कोशिकाओं का आकार कम हो जाता है | और इसकी भरपाई भी हो सकती है शुरुआती अवस्था में बच्चे की सेहत मां की सेहत पर निर्भर करती है | उदाहरण के लिए अगर मां में प्रोटीन की कमी है तो यह कमी बच्चे को स्वाभाविक रूप से मिल जाती है | आयोडीन, जिंक और मैगनीज जैसे खनिज बच्चे के दिमाग के विकास के लिए जरूरी है |उनकी कमी से समझने की शक्ति तो प्रभावित होती ही है साथ ही वह आलसी और दिमागी रूप से कमजोर भी हो सकता है |

कुछ बातें जिन पर गर्भवती को स्वयं ध्यान देना चाहिए-

 

  • मन ना होते हुए भी थोड़ा-थोड़ा खाएं |
  • वही खाएं जो आसानी से पच सकता हूं जो वायु कारक ना हो | जो ना तो ज्यादा गर्म हो नाही ज्यादा ठंडा
  • खाना खाते समय धैर्य रखें | जल्दबाजी ना करें जो भी खाएं खूब चबाये
  • इस बात का विशेष रुप से ध्यान रखें कि आपकी थोड़ी सी भी लापरवाही आपके गर्भ में पल रही संतान के लिए श्राप  सिद्ध हो सकती है इसकी पूरी जिम्मेदारी आपकी है किसी दूसरे की नहीं |

        गर्भवती महिला को प्रतिदिन 1300 कैलोरी की अधिक आवश्यकता होती है | गर्भवती महिला को प्रतिदिन 30 ग्राम या इससे अधिक प्रोटीन की आवश्यकता होती है | प्रतिदिन महिलाओं को 1 किलोग्राम दूध या दूध से बनी चीजें लेनी चाहिए |

       गाय के 250 ग्राम दूध में 1 ग्राम कैल्शियम होता है | यदि भोजन में फास्फोरस व कैल्शियम की मात्रा ठीक नहीं है तो बच्चों में रिकेट्स की बीमारी दातों में कीड़ा लगने का डर रहता है |

 

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